संस्कारों का हस्तांतरण अगली पीढ़ी को ठीक तरीके से न हो तो उस समाज का क्षय होना निश्चित है।

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अश्लीलता दबे पांव नहीं, सीना तानकर इंस्टा यूट्यूब के दरवाजे आपके घर तक आई है- संतोष दास सरल

//आलेख//
इन दिनों नीट पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के हिंसक और अश्लील विरोध प्रदर्शन को लेकर पूरे सोशल मीडिया में प्रदर्शनकारी छात्र छात्राओं के अश्लील गाली-गलौज वाले वीडियो तैर रहे हैं। कुछ लोग Zen-Z के इस शर्मनाक कृत्य को नया ट्रेंड बताकर महिमामंडित कर रहे हैं तो कुछ लोग इसे नए भारत के युवाओं की ताकत बता रहे हैं। भारतीय समाज के बीच से निकलकर आए ये किशोर युवा आखिर कौन हैं जिन्हें मान, मर्यादा, परंपरा, संस्कारों का भान नहीं? याद रखिए ! ये अश्लीलता दबे पांव नहीं, सीना तानकर इंस्टा यूट्यूब के दरवाजे आपके घर तक आई है, और विडंबना देखिए आप इसे Zen-Z की नई सोंच कहकर इसका स्वागत व अभिनंदन कर रहे हैं। आप किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल या फिर किसी विचारधारा के विरोधी तो हो सकते हैं परंतु जिस समाज में आप पले-बढ़े और जिस समाज से संस्कार लेकर आपने जीने का तौर-तरीका सीखा आप उसके विरोधी नहीं हो सकते।

जन्तर-मन्तर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के नाम पर पूरे देश ने जो अश्लीलता, नग्नता और भौंडापन देखा उसने देश के पंद्रह-सत्रह साल के Zen-Z का एक भयावह, विकृत स्वरूप प्रस्तुत कर पूरे भारतीय समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया है। भारतीय समाज पढ़े लिखे युवाओं की असभ्यता पर हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ है। अपने परदादा की उम्र के किसी व्यक्ति के लिए ऐसी गंदी गालियां जिसे कानों से सुन पाना सम्भव ना हो उसे युवा किशोर लड़कियों के मुख से सुननी पड़ जाए तो समाज को चिंता नहीं, चीत्कार करने की आवश्यकता है। Zen-Z के ऐसे अमर्यादित असामान्य व्यवहार पर यदि आप इसलिए खुश हैं कि आप किसी व्यक्ति या सरकार के विरोधी हैं और विरोध में तो सब जायज है वाली बात पर यकीन करते हैं तो याद रखिए आप अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं, सीने पर खंजर चला रहे हैं। समाज की बुराइयों को देखकर खुश होने वाले व्यक्ति के परिवार की संतानें कभी न कभी दुनिया के सामने अपने परिवार को शर्मिन्दा कर कहीं का नहीं छोड़ती। किसी भी समाज में व्याप्त संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बहुत सहेजकर व संभालकर सौंपे जाते हैं और यदि संस्कारों का हस्तांतरण अगली पीढ़ी को ठीक तरीके से न हो तो उस समाज का क्षय होना निश्चित है।

जंतर-मंतर के अश्लील प्रदर्शन को युवाओं में उपजा भारी आक्रोश बताने वाले ये भूल जाते हैं कि इससे भी कई गुना ज्यादा आक्रोश निर्भया कांड को लेकर वर्ष 2012 में था जिसने देश के हर गली मुहल्ले को आंदोलित किया था। देश में भ्रष्टाचार को लेकर अन्ना हज़ारे के विरोध प्रदर्शन से बड़ा ऐसा कोई अनशन या आंदोलन नहीं हुआ जिसका समर्थन देश के प्रत्येक युवा व नागरिकों ने किया हो, परंतु मजाल है कि प्रदर्शन में भाग लेने वाले किसी भी युवा की तख्ती पर तत्कालीन सरकार या व्यवस्था के लिए किसी ने गालियां लिखी हुई देखी हो? या किसी प्रदर्शनकारी युवा की जुबान से पुलिस प्रशासन व सरकार के विरुद्ध गंदी अश्लील गालियों की बौछार किसी ने देखी सुनी हो? रामलीला मैदान और जंतर-मंतर दोनों आंदोलनों की कोई तुलना नहीं क्यूंकि अन्ना आंदोलन अपने आदर्श, मर्यादा व अनुशासन के लिए याद किया जाता है तो जंतर-मंतर का नीट पेपर लीक आंदोलन अपनी फूहड़ता और अश्लीलता के लिए।

जंतर-मंतर का आंदोलन खत्म होने के बाद से देश के Zen-Z की सोंच और दिशा क्या है? यह चिंतन पूरे देश और समाज को भयाक्रांत कर रही है। कहते हैं हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से बेहतर होती है, क्या वर्तमान पीढ़ी के संदर्भ में भी यह बात कही जा सकती है? क्या सदियों से चले आ रहे मानव सभ्यता के क्रमिक विकास में संस्कारों के बिना केवल आधुनिक तकनीक और AI ज्ञान के सहारे वर्तमान पीढ़ी अपनी पहचान बनाने की दिशा में अब बहुत आगे निकल चुकी है? क्या आधुनिक तकनीक के प्रभाव में वर्तमान पीढ़ी स्वच्छंद होकर लोक-लाज के भय से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है?
इन सवालों के जवाब यदि आज नहीं ढूँढे गए तो यकीन मानिए आने वाले समय में भारतीय समाज की पहचान उनके संस्कार व आदर्श अपना अस्तित्व बचाने संघर्ष करते दिखेंगे..!!

सादर..

आलेख-
संतोष दास ‘सरल’
समसामयिक विश्लेषक
अंबिकापुर,9826165324

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